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‘सतीप्रथा, भक्ति काव्य और हिन्दी मानसिकता’

सामान्य

‘सतीप्रथा, भक्ति काव्य और हिन्दी मानसिकता’
अनुराधा
भारतीय ‘हिन्दू स्त्री’ की मनोसंरचना सदा सुहागिन रहने के आर्शीवाद और सुहागिन (पति के जीवित रहते) मरने की मनोकामना के बीच निर्मित होती है। कहीं न कहीं इस सांकृतिक तथ्य में सती किये जाने का भय और जीवित जलाये जाने की पीड़ा एक सामाजिक-ऐतिहासिक सच्चाई के रूप में अन्तर्निहित है। उसके लिये सबसे बड़ा दु:ख ताउम्र इस आतंकित करने वाली मन:स्थिति का बना रहना है। हर क्षण वह इससे निजात पाना चाहती रही है। अपने इतिहास में उसने इस दु:स्वप्न से बचने के लिये सिंदूर और सिंधौरे के साथ न जाने कितने टोटके विकसित किये हैं।
इक्कीसवीं सदी में जब सभ्यता और संस्कृति विकास की नई ऊँचाइयों पर पहुँची दिखती है आज भी स्त्रियां सदियों पुरानी ‘स्त्री के प्रति क्रूर और बर्बर’ कर्मों और उनकी स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पायी है। एक तरफ नये नये तरह के क्रूर प्रसंगों का विकास तो दूसरी तरफ तरह तरह से पुराने प्रसंगों का लौट कर आना स्त्री के प्रति दोहरी बर्बरताओं का बायस बन गये हैं। इनके बीज खास तरह की मानसिकता में सन्निहित हैं। सती पूजा और ‘सती’ की घटनाओं का बार बार दुहराया जाना यह सवाल उठाता है कि वैज्ञानिक विचारधारा, शिक्षा का प्रसार और समृध्द कानून व्यवस्था भी इसको खत्म करने में असफल क्यों है?
सती प्रथा की जड़ें पितृपक्षीय मानसिकता में है। उन्नीसवीं सदी के पूर्वाध्द के एक पुरुष कवि की नजर जब नवजात कन्या पर पड़ती है जो कि जच्चागृह के कोने में जलाई गई आग को देख रही है, तो वह सोचने लगता है कि बच्ची आग हर्षित होकर इसलिये देख रही है कि आगे चलकर उसे सती होना है। स्त्री मानसिकता को ढालने वाली इस मानसिकता की बलिहारी है जो स्त्री के जन्म लेते ही उसके भविष्य की रूपरेखा अपने स्याह मनसूबों से इस तरह तैयार कर देता है कि उसे जिन्दा जलाये जाने सें ही उसकी गौरव गाथा लिखी जा सकती है। यह ‘सती’ का प्रतिमान लम्बे समय से हमारे मानसिक संवेगों को प्रभावित करता रहा है। ‘सती-मइया’ की पूजा, सती स्थलों पर लगने वाले मेले और समय समय पर बार बार होने वाली सती की घटनायें वर्तमान में भी यह बताती है कि यह प्रतिमान आज भी मानसिक संवेगों पर दबावकारी भूमिका अदा करता है। आखिर इसको प्रतिमान बनाने के पीछे का सच क्या हैं? ध्यान देने की बात है कि उक्त कविता का समय वह समय (उन्नीसवीं सदी के पूर्वाध्द) है जब सती प्रथा उन्मूलन एक्ट लागू किया गया था। हिन्दी प्रदेश का इस तरह के मानवतावादी प्रयासों के प्रति क्या रूख रहा होगा अनुमान किया जा सकता है। हिन्दी मानसिकता को इस पृष्ठभूमि पर समझने की जरूरत है।
पितृपक्षीय मानसिकता में निर्मित हुए हिन्दी के आधुनिकबोध ने अपने बनाये गये दायरे में प्राय: ऐसे रवैये अख्तियार किये जिनसे समंजन और सहअस्तित्व (विरुध्दों के सामंजस्य) को ही बनाये रखा जा सके चाहे भले ही इसके लिये जरूरी से जरूरी मुद्दे का दबाना ही क्यों न पडे। हिन्दी साहित्य और आलोचना का क्षेत्र इससे पूरी तरह प्रभावित रहा है। मसलन स्नातक और परास्नातक स्तर पर कबीर की पढ़ाई जाने वाली अनेकों व्याख्यायें कभी भी मन में इस तरह नहीं बैठती थीं कि उन पर भरोसा किया जा सके, हमेशा यही लगता था कि इन कविताओं (स्त्री परक कविताओं) का बताया जाने वाला अर्थ अपनी अर्थवत्ता के अनुरूप नहीं है, कुछ बात ऐसी है जो सामने नहीं आ पा रही है। इन कविताओं में व्यक्त करुण प्रसंग आध्यात्मिकता के कठोर आवरण को जगह जगह से चीर डालते थे तो कई बार प्रगतिशीलता के धरातल पर तैयार तथाकथित लौकिक वैचारिक सन्दर्भ भी हास्यास्पद लगने लगते थे। आखिर वे कौन से खतरे थे जिनसे सावधान होकर हमारे चिन्तकों ने स्त्री के प्रति बर्बर रवैयों पर इतना कठोर आवरण डाला और सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन के क्षेत्र में लगातार तथ्यों को झुठलाते रहे। ऐसे ही पहलुओं पर विचार करना इस लेख का मुख्य विषय है। भक्तिकाव्य में ‘सतीप्रसंग’ और ‘सूर प्रंसग’ तत्कालीन मानसिकता के आदर्श हैं जिनकी उम्मीद क्रमश: स्त्री और पुरुष के जीवन से की जाती रही है। डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है ”यदि भक्त के आत्मबलिदान की झलक कहीं दिख सकती है तो वह सती और सूर में ही दिखती है।” तत्कालीन राज व्यवस्था की(न कि समाज व्यवस्था की) उथल पुथल इस बात को भले ही उचित ठहरा दे कि पुरुषों के लिये ‘शूरता’ का आदर्श महान कर्म था (हालांकि वीरता को व्यवसायिक सन्दर्भों में देखा जाना अधिक न्यायप्रद है न कि मानवता के लिये त्याग के रूप में और यह भी कि सैनिकों द्वारा स्त्रियों के प्रति किये गये अत्याचारों के तथ्यों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है), लेकिन स्त्री के लिये ‘सती’ को आदर्श के रूप में स्वीकार करने को उचित ठहरा पाना आसान काम नहीं है। यह निश्चित रूप से मानवता के प्रति, स्त्री जाति के प्रति जघन्य अपराध है और यह अपराध इन भक्त कवियों से भी हुआ। हालांकि सती प्रसंग का सबसे मजबूत तर्क यह रहा कि ‘पति के प्रेमवश स्त्रियां सती होती थीं और ऐसा करने पर उन्हें आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त होता था’ लेकिन यहां यह बड़ी आसानी से पूछा जा सकता है कि क्या उस समय होने वाले विवाह प्रेम विवाह थे और परिवार के भीतर पति का प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि वह पत्नि को जल मरने के लिए प्रेरित करता था? प्रेम बराबरी पर आधारित मूल्य है तब क्या प्रेम में कभी किसी पुरुष के सती होने की बात सामने आयी? (शब्दकोषों में सती का पुल्लिंग शब्द तक नहीं पाया जाता है।) जबकि उस जमाने की लोक प्रेम-कथाओं में प्रेम के लिये जान देने में स्त्री पुरुष में भेद भाव नहीे पाया जाता। (इस तर्क से यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिये कि प्रेम प्रसंगों में आत्महत्या या हत्या (सती) के किसी भी प्रयास का समर्थन किया जा सकता है)बात साफ है कि सती के आदर्शीकरण में प्रेम के बजाय कुछ और अन्तर्निहित कारण हैं जिनकी छानबीन जरूरी है।
सती का आदर्श वैदिक साहित्य से ही निर्मित होना शुरु हो गया था। ऋग्वेद के सती सूक्त से शुरू होने वाले सती के साक्ष्य महाभारत में कृष्ण के आठ आठ पत्नियों के सती होने से होते हुए पूरे संस्कृत शास्त्रों, पुराणों, स्मृतियों तथा साहित्य में फैले हुए हैं। इन साक्ष्यों पर विवरणों में बात करना मेरे इस लेख का विषय नहीं है। डॉ.रामविलास शर्मा ने सती होने के कारणों पर लिखा है-‘भारत पिछड़ा हुआ देश है, यह साबित करने के लिये सती प्रथा का बार बार उल्लेख किया जाता है। यहाँ के शास्त्रों में और स्मृतियों में स्त्रियों को जो अधिकार दिये गये है, खास तौर पर पति के न रहने पर विधवा को जो अधिकार प्राप्त है…….इन अंशों को एक जगह एकत्र करके एक पुस्तिका रूप में छाप देना चाहिए….इसलिए उनका चिता पर पति के साथ जलना अनिवार्य नहीं था।’ उक्त तर्क देकर ‘शास्त्रों को घोर स्त्रीवादी’ मानने वाले शर्मा जी आगे इस पर चुप हैं कि फिर आखिर सती होती क्यों थी और सती करने के विधानों को इतना सजाकर शास्त्रों में क्यों बिठाया गया। रामविलास जी का एक और तर्क है कि ‘पश्चिमी विद्वानों खासकर विदेशी यात्रियों के वर्णनों में भारत की छवि को धूमिल करने की मंशा शामिल है इनके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर विश्वास नहीं करना चाहिये।’ शरत्चन्द्र तो पश्चिम के नहीं है। ‘नारी मूल्य’ रचना में शरत्चन्द्र लिखते हैं ” स्वामी की मृत्यु के बाद ही उसकी विधवा को एक कटोरा भाँग और धतूरा पिलाकर नशे में मदहोश कर दिया जाता था। जब वह श्मशान की ओर जाती थी तो कभी हँसती थी कभी रोती थी और कभी रास्ते में जमीन पर लेटकर ही सोना चाहती थी। यही उसकी हँसी थी और यही उसका सहमरण (सती) के लिये जाना था। इसके बाद उसे चिता पर बैठा कर कच्चे बांस की मचिया बनाकर दबाकर रखा जाता था क्योंकि डर रहता था कि शायद सती होने वाली स्त्री दाह की यन्त्रणा न सह सके। चिता पर बहुत अधिक राल और घी डालकर इतना अधिक धुंआ कर दिया जाता था कि उस यंत्रणा को देखकर कोई डर न जाये और दुनिया भर के इतने अधिक ढोल-ढक्के, करताल और शंख आदि जोर जोर से बजाए जाते थे कि कोई उसका चिल्लाना रोना-धोना या अनुनय विनय न सुनने पाये। बस यही तो था सहमरण।” शरतचन्द्र का यह विवरण सती होने के करुण प्रसंगों और सामाजिक नृसंशताओं के सामने लाकर भारतीयता के तर्क के सहारे सती के आदर्शीकरण की प्रवृत्तियों को नकारने को प्रेरित करता है। असल बात है कि ब्राह्मणमना प्रगतिशीलता की पूरी परम्परा छद्मों के सहारे पिछले ड़ेढ़ सौ सालों से लगातार समाज के पीड़ित तबकों के वास्तविक अभियुक्तों को बचा ले जाने में कामयाब रही हैं। खासकर हिन्दी की प्रगतिशील पीढ़ी कदाचित ही डॉ. शर्मा के विचारबिन्दुओं से बाहर निकल पायी है। सती होने के बारे में प्रगतिशील बुध्दिजीवी भी जो तर्क देते है उनमें मुख्य भूमिका परमार्थ लाभ के झांसों की है, सहयोगी भूमिका सम्पत्ति के अधिकार की।
नवजागरण के समाज चिन्तकों ने परम्परा के प्रति जो नजरिया अख्तियार किया वह भी कमोवेश इसी पितृपक्षीय भाव भूमि पर खड़ा दिखता है, जो अपना चेहरा सुर्खरू रखने के लिये लगातार झूठ का सहारा लेता रहा है। सती प्रथा के विरोध के आन्दोलनों का भी तर्क यही रहा कि हमारे यहां प्राचीन समय में सती जैसी कोई परम्परा नहीं रही, यह सब मुसलमान शासकों के आने के बाद अपनी मान मर्यादा की रक्षा के लिये उठाया गया कदम था, आखिर हतदर्प जाति क्या करती? (क्या ऐसी मन:स्थिति में अपनी स्त्रियों को जलाया जाना ही पितृपक्ष के दर्प-रक्षा का मात्र सहारा था? क्या कभी किसी स्त्री ने अपनी दर्प रक्षा के लिए अपने पुरुष को जलाया या हत्या की ? ) सती प्रथा विरोध के पुरोधा राजा राममोहन राय का मानना था कि ऐसा केवल बंगाल में होता है और थोड़े दिनों से ही हो रहा है। वे सती को एक तरह की आत्महत्या ही मानते थे, हत्या नहीं। आत्महत्या मानने में दोषी स्त्री ठहरती है, जबकि हत्या मानने में दोषी पितृपक्ष ठहरता है। (दोष किसका और दोषी कौन ठहराया जा रहा है?) अगर सती को आत्महत्या मानें तब भी तो इसके पीछे जिम्मेवार वह ‘स्त्री निर्माण प्रक्रिया’ है जो स्त्री के जहन में इस तरह की आत्महत्या के लिये प्रोत्साहन पैदा करती थी और वह ‘पितृसत्ता’ है जिसने सती की सिला पर अपने गौरव की नींव रख रखी थी। सती होने का निर्णय इस निर्माण प्रक्रिया, पारिवारिक प्रतिष्ठा और मृत्यु के आवेशित क्षणों में होता था और सती के निर्णय ले लेने के बाद स्त्री को इतनी मात्रा में भाँग पिलाते रहते थे कि वह लगभग अचेतावस्था में रहे और अपना निर्णय पर पुर्नविचार भी न कर सके, ऐसी अवसादपूर्ण अवस्था में आत्महत्या के लिये नशा कराने वाले और बहु प्रकारेण प्रोत्साहित करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों को कानूनी तौर पर हत्या का दोषी मानने में ही न्याय है। जबरदस्ती हाथ पाँव बाँध कर सती कराये जाने के मामले तो सीधे सीधे हत्या के मामले हैं ही। सती होने के लिए स्त्री की हाँ और ना के अन्तर को समझा जाय तो जिस तरह ‘हाँ’ का उल्टा ना है उसी तरह ‘सती’ का उल्टा ‘कुलटा’ है। क्या ना कहकर कोई स्त्री कुलटा बनकर सामाजिक जिन्दगी जी सकती थी? इस द्वन्द्वपूर्ण मन:स्थिति में उसकी चुप्पी को ही उसके परिवारीजन हाँ घोषित कर उस स्त्री का निर्णय करार देते थे- ‘मौनम् स्वीकार लक्षणम्’। मान्य इतिहासकारों ने भी बाद में सती के सन्दर्भ में नवजागरणीय विमर्श के स्वर में अपना राग अलापते हुए थोड़े बहुत संशोधन के साथ वही बातें दुहराईं। राम शरण शर्मा ने अपने लेख ‘सती प्रथा के एतिहासिक पहलू’ में सती के विकास के कारण गिनाये हैं, गुप्ता काल के बाद सती प्रथा फैली, सती प्रथा केवल लड़ाकू समुदायों के अंतर्गत वर्ग-विभाजित, संपत्ति-आधारित एवं पितृसत्तात्मक समाज के ही कारण पैदा नहीं हूई बल्कि विधवा को आत्म-हत्या अनुष्ठान से प्राप्त होने वाले पुण्य में गहराई से गड़ी भावना के कारण भी उत्पन्न हुई।’ ये बीसवीं सदी के उत्तरार्ध्द का रवैया है। वही पुण्य भावना और वही आत्महत्या का तर्क जो स्त्री को मूर्ख और लालची साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
सती होने के इन गोल मोल तर्कों से कैसे सहमत हुआ जा सकता है? उदाहरण मिलते हैं कि बारह साल की लड़कियों को जिनका गौना तक नहीं हुआ होता था, हाथ पैर बांध कर जलती चिता में फेंक दिया जाता था। बर्नियर ने एक विवरण ऐसी घटना का दिया है ‘मैंने लाहौर में एक बहुत ही सुन्दर लड़की को जलते हुए देखा। मैं समझता हूं कि उसकी अवस्था बारह वर्ष से अधिक न होगी। वह लड़की उसी तरह चिता के निकट लायी गयी भय के कारण अधमरी सी मालूम होने लगी। वह काँपती थी और बिलख बिलख कर रो रही थी। इतने मैं तीन चार ब्राह्मण जिनके साथ एक बुढ़िया भी थी और जो उस लड़की को गोद में लिये थी आये और उसे चिता पर बैठा दिया, उसके हाथ और पैर बांध दिये, इस प्रकार उसे जीवित ही जला दिया।’ यह किस पुण्य की भावना है? और किस तरह की गयी आत्महत्या है? हठात् कबीर की कविता याद आती है ‘करो जतन सखी सांई मिलन की। गुड़िया गुड़वा सुपलिया, तजि दे बुधि लरिकैया खेलन की ।…….कहि कबीर निर्भय होइ हंसा, कुंजी बता द्यौ ताला खुलन की।’ गुड्डे गुडियों से खेलती लड़की के हाथ से खिलौना छीनकर उसे लाकर चिता में झोंक दिया जाता है और कहा जाता है कि यह पति से मिलने का रास्ता है (इस लोक में न सही परलोक में सही)। इस आग से बच निकलने के तरकीब के लिये निर्भयता की जरूरत है जो कबीर जैसे निडरों में भी नहीं है, उस नादान लड़की की तो बात ही क्या। सती की घटनाओं के एतिहासिक पहलुओं पर नजर डालें तो अधिकतर कम उम्र की नादान स्त्रियों के सती होने की घटनायें की मिलती हैं। दूसरे सती अकाल मृत्यु (बीमार, दुर्घटना, युध्द आदि के कारण) से मरने वाले पुरुषों के साथ ही किया जाता था। तीसरे सती होने वाली स्त्रियां हमेशा होने न होने के गहरे द्वन्द्व की शिकार होती थी जिसे शमन के लिए नशीले पदार्थोें का सेवन कराया जाता था। यह विश्वास कि अकाल मृत्यु के बाद आत्मा के लिए स्वर्ग दरवाजे के बन्द होते हैं। सती स्त्री अपने सतीत्व के बल पर उसे स्वर्ग में ले जा सकती है।यह माना जाता है कि भटकनेवाली आत्मायें घूम घूम कर अपने स्वजनों के पास आती हैं। स्वजनों को अपने कर्मों के कारण हमेशा यह भय रहता है कि यह आत्मा उसकों नुकसान न पहुँचाये उसके लिए यह जरूरी है कि उसे स्वर्ग तक पहुँचाया जाय। पितृसत्तावादी समाज में इसका एक मात्र रास्ता है कि उसकी पत्नि को उसके साथ सती कर दो ताकि वह अपने पति को स्वर्ग पहुँचाये और बाकी लोग उसके प्रकोप से बच सकें। यही वह गुत्थी है जो सती को जन्म देती है। अब इस विश्वास के ऐतिहासिक विकास पर मानवशास्त्रीय अनुसंधान की दरकार है। लेकिन एक बात कही जा सकती है कि मातृसत्तात्मक समाजों में यह विश्वास नहीं पनपा अन्यथा पुरुषों को जलाये जाने के मामले भी प्रकाश में आ सकते थे। सती होने के सम्बन्ध में लोक में एक और मत प्रचलित है कि सती को कोई जलाता नहीं था वह तो अपने सतीत्व की आग से स्वयं भस्म हो जाती थी। सती होने की घटनाओं को देखने के लिए सती स्थल पर हर किसी के जाने की अनुमति नहीं थी, खासकर स्त्रियां और बच्चे तो प्रतिबन्धित थे। सती होने के किस्से सती करके लौटने पर वही लोग सुनाते थे जो उस प्रक्रिया में संलग्न होते थे चाहे वे चिता के चारों ओर लाठियां लिए खड़े हो या आग लगा रहे हों या ढोल बजा रहे हों। समझा जा सकता है कि ये लोग अपने कर्मों के प्रति कितना झूठा प्रचार करते थे। यदि सारी घटना सच सच बयान कर दी जाती तो यह जानलेने के बाद कि चिता से भागती जलती हुई स्त्री को जबरदस्ती लाठियों के बल पर धकेलकर चिता में फेंक दिया गया है तो कोई भी स्त्री सती होने के लिए किसी भी शर्त पर तैयार नहीं होती।
सती होना या किया जाना व्यापक उपक्रम रहा है। यह व्यक्तिगत निष्ठा का सवाल शायद ही कभी रहा हो। या तो पारिवारिक प्रतिष्ठा का सवाल है या फिर सती होने से बच निकलने के बाद की दुर्दशा की मजबूरी। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बर्नियर ने लिखा है कि ‘जो स्त्रियां चिता देखकर डरती और इस प्रकार भाग जाती हैं वे अपनी जाति वालों से मिलने या उनके साथ रहने की आशा कभी नहीं कर सकती क्योंकि वे लोग उसे बहुत बदनाम कर देते हैं। स्त्री इतिहास की ‘डाइन’ की अवधारणा के पीछे सती की घटना जिम्मेदार है, भागने वाली स्त्रियां पुन: लौटकर अपने सगे सम्बन्धियों से न मिल सकें इसलिये उसको इतना भयावह तमगा दिया जाना जरुरी कदम था और इसलिये भी कि सनद रहे। ‘डायन’ के रूप में प्रचलित नकारात्मक मान्यताएं कहीं न कहीं सती होने से किसी भी अवस्था में भाग जाने को रोकने के लिये स्त्री मानस को तैयार करने के तरीके थे। ‘डायन’ के साथ बच्चों को ही जोड़कर बातें प्रकाश में आती हैं। बच्चों वाली माँओं को भी सती कर दिया जाता था। यदि वह सती होने से भाग गयी तो उसकी ममता तो नहीं मर जाती। उसके स्तनों में दूध उतरना तो नहीं रुक जाता। बहुत सम्भव है कि उसके ममता और दूध उतरने के क्षणों में उसे बच्चों के संसर्ग की इच्छा जोर मारती हो और वह बच्चों को देखकर उनमें अपने बच्चों की छवि देखने लगती हो और कई बार भरे हुए दूध की पीड़ा से निजात पाने के लिए किसी छोटे बच्चे को अपना दूध पिलाने लगती हो। यही बात इसका आधार बनती है कि डायनें बच्चों को अपना दूध पिलाकर मार डालती है। हो सकता है कि अपने बच्चों को याद को वह दूसरे बच्चों के साथ कुछ क्षण बिताने में पूरा करती हो यही बात इसका आधार बनती है कि डायन बच्चों को बहला कर उठा ले जाती है। ‘डायन’ की इस परिकल्पना में स्त्री के दु:खों की वह कहानी छुपी है जिन्हें वह सिर्फ और सिर्फ जिन्दा बचे रहने के कारण भोगती है।
सती के ‘मिथ’ के विकास में ‘प्रदर्शनात्मक उपभोग’ का भी बड़ा योगदान है। जिस तरह ‘प्रदर्शनात्मक उपभोग’ में सामाजिक प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिये अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी तट की जनजातियों में तो वर्ष भर की जी तोड़ मेहनत कर इकट्ठी की गई कमाई को सीधे सीधे आग तक लगा देना या लुटा देने की प्रथायें रहीं है। बाद के समाजों में जब स्त्री के अवमूल्यन के परिणाम स्वरूप उसे निजी सम्पत्ति के रूप में मान लिया गया तब उसी तरह धर्मशास्त्रीय तर्कों के सहारे उसको ‘प्रदर्शनात्मक उपभोग’ के लिये जलाया जाना ही सती की अर्न्तवस्तु है।(सम्पत्ति और सम्पत्ति के अधिकार दोनों में स्पष्ट भेद करना होगा और सती के मामले में ‘स्त्री के लिये सम्पत्ति के अधिकार’ जैसी बात कैसे हो सकती है जबकि स्त्री स्वयं निजी सम्पत्ति है।)परिवार अपनी साख को चरम पर पंहुचाने के लिये इस प्रथा का सहारा लेता रहा है। सती होने से दोनों कुल तरते है, दोनों की प्रतिष्ठा बढ़ती है, इसके लिये दोनों ही परिवार स्त्री के मानस में सती का आदर्श गढ़ते रहे है। (सती होने की संख्या में तब तब तेजी से बढ़ोत्तरी देखी जा सकती है जब जब व्यक्ति के रूप में स्त्री का अवमूल्यन हुआ है।) डॉ.विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने लेख ‘वर्णव्यवस्था, नारी और भक्ति आन्दोलन’ में लिखा है ”शासक के मरने पर केवल पत्नियां ही नहीं सती होती थीं, नौकर और चाकर भी जलते थे। परलोक में राजा को पान कौन खिलायेगा, हजामत कौन बनायेगा, कपड़े कोन धोयेगा? खाना कौन खिलायेगा? ब्राह्मण देवता भंडारी थे, उन्हें भी जलना चाहिये। लेकिन वे बच जाते थे। ‘(ध्यान देने की बात है कि यहां वे शासक वर्ग की विलासिता को सती का कारण बताकर उसका सूफियाना विरोध कर रहे हैं।) त्रिपाठी जी का तर्क मजबूत है कि जिसने इस लोक में श्रम न किया हो वह भला कैसे झेलेगा। लेकिन राजमहलों में रानियां भी उन सभी सुविधाओं का लाभ प्राप्त करती थीं। उनके लिये भी नौकर चाकर और रसोइयों की व्यवस्था होती थी और बहुत बार ऐसा होता होगा कि राजा जिन्दा रहता होगा रानी मर जाती होगी। क्या राजा के जिन्दा रह जाने पर परलोक में रानियों के लिये इन सुविधाओं की जरूरत नहीं रहती होगी? तो फिर रानियों के मरने पर उसके साथ कभी एक भी अनुचर जलाया गया हो इसकी चर्चा क्यों नहीं पायी जाती।(हां मरने के बाद परलोक में राजा तो राजा ही रहता हो पर रानी से उसकी रानी की प्रस्थिति छीनकर साधारण स्त्री मान लिया जाता हो तो अलग बात है) त्रिपाठी जी का दूसरा तर्क निराश्रितता का है-निराश्रित रह जाने पर भी लोग अपने आश्रयदाता के साथ जल मरते थे। ध्यान देने योग्य बात है कि किसी को भी आश्रय एक व्यक्ति का न होकर एक व्यवस्था का मिलता है और व्यक्तियों के मर जाने से व्यवस्थाओं का अन्त नहीं होता। एक राजा के मर जाने पर पहले उसका वारिस राज्य सभांलता था और बाद में राजा का अन्तिम संस्कार होता था। तब निराश्रितता का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि इसका क्रेडिट स्वामिभक्ति को दिया जाता तो अलग बात है। डॉ.लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने लिखा है कि वह जमाना ही अन्धविश्वास का था। काशी में एक दिन में जितनी स्त्रियां सती होती थी उससे अधिक पुरुष गंगा में करवट ले लेते थे। सती के रूप में स्त्री को जलाने वाले को अन्धविश्वास का शिकार कहकर क्लीनचिट दे दी जाती है। समझा जा सकता है कि हिन्दी आलोचना तर्कों का एक मनोहर जाल खड़ा करके किस तरह ‘पुरुष’ को बचा ले जाती है।
भक्तिकाव्य और मध्ययुग की व्याख्या करते समय स्त्री की स्थिति पर तरह तरह से चर्चा की जाती रही है। हिन्दी साहित्य में भक्त कवियो के सन्दर्भ में कवियों के स्त्री के प्रति रवैये को लेकर उन्हें कम और अधिक महान साबित करने के प्रयास ही किये गये। इस दौर के सबसे संजीदा व्यक्ति कबीर के काव्य का पाठ करते समय उसके स्त्री सम्बन्धी विभाव पक्ष को या तो समझा ही नहीं गया या फिर नकारा गया या फिर पितृसत्ता के लाभ के अनुरूप ग्रहण कर लिया। इन सब बातों में पितृपक्ष का स्त्रियों के प्रति रवैये का पता चलता है। कबीर की अनेक कविताएं हैं जिनको लोक-परलोक, वैवाहिक प्रेम, ईश्वर प्रेम और विवाह सम्बन्धी कुरीतियों (बाल विवाह, बेमेल विवाह आदि) से सम्बन्धित करके व्याख्यायित किया गया, जबकि असलियत में उन पदों में कुछ और ही बात है, हमारा पितृपक्ष हमें लगातार भरमाकर इस तथ्य से दूर ले जाता रहा है। प्रसिध्द पद ‘दुलहिनि मोरी गावहुं मंगलचार’ को ‘मंगलाचार’ शब्द पर जोर देकर सीधे सीधे विवाह उत्सव का गीत व्याख्यायित किया गया, परन्तु विवाह में ‘सरोवर के किनारे वेदी’ बनाने का विधान तो है नहीं और राजस्थान में सती के गीतों को ‘मंगलाचार’ कहते हैं। यहाँ यह बात उठाते ही व्याख्या खण्ड खण्ड हो जाती हैं। ‘सरोवर’ पर जोर देते ही अर्थ विधान ‘दुल्हन’ को ‘सती’ के लिये लायी गयी स्त्री में बदल देता है। तत्कालीन दौर के घुमक्कड़ इब्बन बतूता ने अपने यात्रा वृतान्त में लिखा है ‘तीन कोस चलने के बाद हम एक ऐसी जगह पहुचे जहाँ जल की बहुताइत थी और वृक्षों की सघनता के कारण अन्धकार छाया हुआ था। यहाँ चार गुम्बद (मन्दिर ) बने हुए थे और चारों में एक देवता की मूर्ति प्रतिष्ठित थी। इन चारों के मध्य एक ऐसा सरोवर था जहाँ वृक्षों की सघन छाया होने के कारण धूप नाम को भी न थी।…….इस कुण्ड के पास नीचे स्थल में अग्नि दहकायी गयी।…..पन्द्रह पुरुषों के हाथों में लकड़ियों के गट्ठे बंधे हुए थे और दस पुरुष अपने हाथ में बड़े बड़े कुन्दे लिये खड़े थे। नगाड़े नौबत और शहनाई बजाने वाले स्त्रियों की प्रतीक्षा में खड़े थे।……इतना कहकर वह प्रणाम करकर तुरन्त उसमें कूद पड़ी। बस नगाड़े, ढोल ,शहनाई और नौबत बजने लगी। उपस्थित जनता भी चिल्लाने लगी। कबीर के उक्त पद के काव्य संवेदन संसार इब्बन बतूता के वर्णनों के साथ पढ़ा जाय तो पितृपक्षीय दृष्टियों का वह कमाल उजागर हो जाता है जो कि काव्य संवेदना को रहस्यवाद का जामा पहनाकर स्त्री इतिहास के करुणतम पक्ष को भी जिन्दा दफन कर देता है, स्त्री के जिन्दा जलाये जाने के अनुष्ठान और विवाह के उत्सव दोनों में घालमेल कर डालता है। इसी तरह की कविता रैदास लिखते हैं। मंगलाचार है, भरतार है, मन्दिर है, पीतम है, करतार है, लेकिन वे सन्दर्भ गायब हैं जो कबीर की कविता के सती सम्बन्धी होने के पक्के प्रमाण देते हैं। दोनों कविताओं को साथ रखकर पढ़ा जाय तो अब तक तथ्यों की मनमानी व्याख्या करने वाली हिन्दी मानसिकता का रवैया और स्पष्ट दिखाई देगा।
भक्तिकाव्य में कबीर ही ऐसे कवि है जो सती की करुणा का अनुभव साहित्य को दे पाते हैं। लिखने को तो जायसी ने पद्मावत में सती खण्ड की रचना करते हुए लिखा है ‘लागीं कंठ आगि दै होरी। छार भई जरि अंग न मोरीं॥’ यह अनुभव सुने हुए वर्णनों का ही है जो कि पितृपक्ष सती के आदर्शीकरण के लिये करता था। राजस्थान उस समय में सती की चीत्कारों से कराह रहा था। धरती राख से काली और आकाश चिताओं की लपटों से लाल था। इसकी अतिशयता ने मुस्लिम शासकों को सती पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये प्रेरित किया। अकबरनामा में अबुल फज्.ल ने लिखा है कि सती को रोकने के लिये हर कस्बे और जिले में ईमानदार प्रेक्षक नियुक्त किये गये थे और सती होने के लिये राजाज्ञा लेनी आवश्यक कर दी थी। जबरन सती को रोकने के सख्त निर्देश थे। ‘जबरन सती’ शब्द पर विशेष ध्यान देना होगा। जो लोग पश्चिमी यात्रियों के विचारों का भारत की छवि धूमिल करने का दुष्प्रचार मानते हैं और सती प्रथा का स्वैच्छिक और पुण्यप्राप्ति का साधन बताते हैं उनसे ‘जबरन’ का अर्थ पूछना होगा। इस समय राजस्थानी में सती की घटनाओं को लेकर कविताऐं लिखी गयीं पर उन सबमें सती की प्रशस्ति और महिमामण्डन ही भरा हुआ है। स्त्री के भय, दु:ख और तनाव का कहीं नाम ही नहीं है। चमत्कार की लीला है कि राजस्थान की इतनी स्त्रियां जलकर अपनी पवित्रता का प्रमाण देती चली गयीं और उफ तक नहीं किया। भक्तिकाव्य और भक्ति आन्दोलन के विकास में ‘संस्कृतीकरण'(श्रीनिवासन की सामाजिक विश्लेषण की अवधारण) की प्रक्रिया के महत्व को जब तक तरजीह न दी जाय बात को पूरी तरह समझना कठिन है। निम्न जातियों में आया आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की रक्षा का भाव उन्हें उच्च जातियों में प्रचलित ऐसी प्रथाओं को महत्व देने और अपनाने के लिये प्रेरित करता है जो कि सामाजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा को बढ़ाती हैं। उच्चजातियों में सती का आदर्श प्रदर्शनात्मक उपभोग के जरिये उच्च प्रतिष्ठादायक रहा है। स्वाभाविक रूप में निम्नजातियों और निम्नवर्ग से आने वाला सन्तों का समूह इस ीपही मेजममउ हंपदपदह तपजनंस पर लहालोट है। आज सती कानूनी तौर पर प्रतिबन्धित है लेकिन किसी विधवा स्त्री को विधवा बने रहने के लिये (विधवा पुर्नविवाह रोककर) ‘लोक-समाज’ किस तरह का मायाजाल फैलाता है और उससे किस तरह अपनी प्रतिष्ठा के बढ़े होने का अनुभव करता है इसके आधार पर सती प्रकरण के प्रतिष्ठादायक प्रसंग को समझा जा सकता है। सन्तकाव्य में सती के प्रति अपार निष्ठा के पीछे यह भावना मानी जा सकती है, सभी सन्तों ने सती के आदर्श को समान रूप से जगह दी है। कबीर इस माइने में अलग हैं कि वे सती के रूप में प्रचलित अनाचारों से व्यथित हैं (पर उसका विरोध कहीं नहीं कर पाते)। कबीर सती के उस रूप से परहेज नहीं रखते जिसमें सती होने की इच्छा वास्तव में स्त्री क़े प्रेम की पराकाष्ठा हो,(साँई से लगन कठिन है भाई/……..जैसे सती चढ़ी सत ऊपर पिया की राह मन भाई।) लेकिन जबरदस्ती की सती की घटनाओं से उन्हें इत्तिफाक नहीं है।( और प्रेम की पराकाष्ठा पर आधारित सती एक आदर्श मात्र है, व्यवहार तो सारा का सारा या तो जबरदस्ती है या फिर मजबूरी)। कबीर के जबरदस्ती सती के प्रति रवैये को मुसलमान शासकों द्वारा इस तरह की सती की घटनाओं पर आलोचनात्मक विचारों के प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है।
सती होने की घटनाओं का मध्यकाल में ऑंखों देखा हाल जानना है तो कबीर की कविता सुनाती है ‘सती जलन कूं नीकसी, पिउ का सुमिर सनेह। सबद सुनत जिउ नीकल्या भूलि गई सब देह।” घर से सती होने को निकली वह पति के प्रेम की तथाकथित प्रतिज्ञा में भूली हुई थी, ढ़ोल नगाड़ों की आवाज और सती के जयघोषों की भयावह आवाज से ही दम निकल रहा है, अब देह की सुध भला कैसे आ सकती है। जिउ निकलना कोई साधारण क्रिया कलाप नहीं है। पीड़ा को गम्भीर संकेन्द्रण यहाँ है। पूरे काव्यव्यापार का बलाघात इसी एक बिन्दु पर है। कबीर मर्मज्ञ डॉवासुदेव सिंह की सुनिये ”जीवात्मारूपी सती ने अनाहद नाद (बाद्य) के प्रोत्साहन से प्राण त्याग दिये।” हिन्दी मानसिकता का रवैया यहाँ साफ तौर पर देखा जा सकता है कि वह इस कविता में योगियों के अनाहद-नाद जो कि साधनावस्था में जीवात्मा और परमात्मा के मिलन की घड़ी में उत्साह बर्धक भूमिका अदा करता है, आनन्द की चरम स्थिति को व्यक्त करता है, के रूप में व्याख्यायित कर डालती है, जबकि यह कविता समाज में घट रही इतिहास की क्रूरतम और भयावह घटना से बनती है। यदि यह मान लें कबीर का मन्तव्य उस विशिष्ट दार्शनिक सत्य को उद्धाटित करना है तो कबीर के द्वारा अपनाया गया सती का यह ‘रूप-विधान’ निंदनीय है और यदि नही ंतो हिन्दी आलोचना के ऐसे प्रयास निंदनीय हैं जो खींचतान कर उसे दर्शन के ऐसे आयामों तक ले जाते हैं। पर कबीर की कविताएं पढ़कर कभी ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने इतनी अमानवीयता पायी थी। फिर दोष सीधे हिन्दी आलोचना पर जाता है जो कि ऐसे क्रूरतम क्षणों में भी आनन्द की खोज कर लेती हैं। कबीर की विचारधारा पर ध्यान दिया जाय तो पता चलेगा कि वे न तो वैष्णव हैं, न सन्त हैं और न ही योगी। इन खानों से बाहर जाकर देखा जाय तभी उनकी कविता की समझ पैदा की जा सकती है। लोक की एक खास विशेषता है कि वह किसी विशिष्ट अवधारणात्मक पदावली को ग्रहण तो कर लेता है पर उसकी अर्न्तवस्तु के प्रति अवसर के अनुकूल व्यंग्यात्मक खिलवाड़ उन पदों के साथ करता है। कबीर के द्वारा ग्रहण विभिन्न अवधारणत्मक पदों में यही बात साफ तौर पर देखी जा सकती है।
कबीर की कविता पर सती प्रकरण को लेकर बात करना इसलिये जरूरी है क्योंकि अब तक का सोचविचार का पितृपक्षीय दायरा मध्ययुगीन साहित्य में अधिक से अधिक श्रंगार और मात्र कुछ धार्मिक आडम्बरों के विरोध भर को ही देख पाता है। ”धर्म के बाह्याडम्बर और शास्त्रीय जकड़बन्दी के प्रति संवेदनशील मन का विद्रोह ही भक्ति है।” उनके लिये भक्ति की शक्ति प्रेम की बराबरी और सघनता तक सिमटी है। इससे आगे वे यह नहीं देख पाते कि आधी आबादी कहां गयी? (जबकि प्रेम में स्त्री को भी बराबरी का हक होना चाहिए।) कबीर की कविता सती प्रसंगों को सामने लाकर यह दिखाती है कि देखो आधी आबादी वह जल रही है या जलायी जा रही है।’ विरह जलाई हौं जलूं, जलती जलहर जाउं। मो देख्या जलहर जलै, संतो कहाँ बुझाउं॥’ सती की घटना को जिस सरोवर के किनारे अन्जाम दिया जाता है यदि उस सरोवर के दूसरे किनारे बैठकर देखा जाय तो निश्चित रूप से जलने वाली परछाईं के कारण सरोवर भी जलता मालूम होगा। चारों तरफ आग ही आग दिखाई दे रही है। सती के लिए तो यह आग ही विभीषिका है। इससे साफ है कि कबीर अकेले हैं जो इस तरह की घटनाओं के साक्षी हैं वे समाज के ऐसे क्रियाकलापों से संवेदित होते थे। लेकिन हिन्दी आलोचना का कहना है कि ”यह साखी केवल विरहाग्नि की तीव्रता बताने के लिए की गई है और इसमें कोई अन्योक्ति नहीं।” इस तरह की आलोचना पध्दति ने अब तक के हिन्दी साहित्य के इतिहास को ऐसे ही मनमाने निर्णयों से भर दिया है जो कि कभी भी यह ध्यान नही रखते कि अपने ऐसे कृत्यों से वे परम्परा के साथ किस तरह से खिलवाड़ कर रहे हैं।
कबीर की कविता को सती के विरोध की कविता कभी नहीं माना जा सकता। वे भी अन्य कवियों की तरह अनेकों बार सती का महिमामण्डन पूरे मनोयोग से करते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि सती की व्यथा का कोई अनुभव करता है तो भक्तिकाव्य में वे अकेले कवि हैं। यदि इन कविताओं का कालक्रम निर्धारित होता तो सती के प्रति उनके विचार के विकास को रेखांकित किया जा सकता था। बहुत सम्भव है कि किसी काल में उनके लिए सती एक आदर्श रहा हो और किसी अन्य समय में सती की घटनाओं को ऑंखों से देखने के बाद वे अपने इस आदर्श पर कायम न रह पाये हों। कबीर के ‘दुलहिनि मोरी गावहुं मंगलचार’ पद पर आचार्य परशुराम चतुर्वेदी कहते हैं कि यह दाम्पत्यभाव पूर्ण रचना है और ‘जोवन मदमाती’ स्त्री का उमंग प्रदर्शन है। इसके उलट भारतीय विवाह प्रणाली में विवाह के अवसर पर स्त्री का रोना एक स्वाभाविक सा उपक्रम हेै, जबकि सती होने के समय उसका रोना स्वीकार्य नहीें है, उसे उन्माद और खुशी का प्रदर्शन करना अनिवार्य है। विवाह और सती की प्रथाओं में स्त्री के साथ किये गये व्यवहार में बहुत कम अन्तर है। कुछ ही बातें हैं जो सती और विवाह के कर्मकाण्डों में अन्तर करती हैं। राजस्थानी साहित्य में यह मिलता है कि सती के समय गाये जाने वाले गीत ‘मंगलाचार’ के नाम से ही जाने जाते हैं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि जगह जगह के हिसाब से जिस तरह विवाह के कर्मकाण्ड अलग अलग हैं उसी तरह सती होने के रूप भी अलग अलग है। दक्षिण भारत में कोरोमण्डल के तट पर सती स्त्री को पति के साथ जलाया नहीं जाता, वहां के बारे में ट्रेवेनियर ने लिखा है कि वहां पति की चिता जल जाने के बाद उसके पास ही खास तरह से गङ्ढा खोद कर स्त्री को उसमें घुसने के लिये कहा जाता था और उसके घुसते ही गङ्ढे का फुर्ती से मुंह बन्द करके उस पर तब तक कूदा जाता था जब तक कि यह विश्वास न हो जाय कि अब वह मर चुकी होगी। उसे गङ्ढे में घुसने से पहले यह अहसास भी नहीं होता था कि उसके साथ क्या होने वाला है। मालवा में पान के बीड़े से शुरू होता है सती का मृत्यु उत्सव। मालवी का एक लोकगीत है ‘बावड़ लो नी बीड़ो पान को’। पान का बीड़ा लेने के बाद ‘स्त्री’ के लिये सती का प्रश्न प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है। विवाह के साथ घूंघट धारण करने वाली स्त्री का घूंघट सती का बीड़ा लेते ही हटजाता है (सिर उघड़ जाता है)। कबीर जब कहते हैं ‘तोको पीव मिलेंगे घूंघट के पट खोल रे….कहैं कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे।’ तो सती प्रकरण उसके ध्यान में है। जबकि हिन्दी आलोचना कहती है कि यह पद पर्दा प्रथा के विरोध को दिखाता है। एक पद है ‘मैं अपने साहब संग चली। हाथ में नरियल मुख में बीड़ा, मोतियन मांग भरी। लिल्ली घोड़ी जरद बछेड़ी, तापै चढ़ि के भली।’ यह सती होने के लिये ले जायी जाती स्त्री का चित्र है। इब्बन बतूता लिखता है कि चौथे दिन घोड़े लाये गये और वे तीनों बनाव सिंगार कर सुगंधि लगाकर उन पर सवार हो गयीं।उनके दाहिने हाथ में एक नारियल था जिसको ये बराबर उछाल रही थीं।….आगे आगे नगाड़े तथा नौबत बजती जाती थी। कई इलाकों (जैसे आगरा के आसपास) में एक झोंपड़ी में मृत पति को गोद में लेकर बिठा दिया जाता था, बाहर जलाने के लिये पर्याप्त साधनों के साथ तैयार मुद्रा में जन समुदाय होता था। जैसे ही वह अन्दर मशाल या दीया जलाती थी, बिना देर लगाये सारी सामग्री उस झोंपडी पर डालकर आग लगा दी जाती थी। नगाडे बजने लगते थे, लोग राम राम और सती का जयकार उसके जलने तक जारी रखते थे। जहांगीर के समय की ऐसी घटना का विवरण फ्रांस्सिको पैल्सर्ट ने अपने यात्रा वृतान्त में दिया है। कबीर की कविता में जो शून्य महल में दिया जलाने या मन्दिर में पिय के साथ सोने का जिक्र बार बार आता है उसका रहस्य इन सती की घटनाओं में निहित है।
मघ्ययुग में आये यात्रियों का साफ कहना है कि मुसलमान हिन्दुओं के रीति रिवाजों में दखल नही देते थे, (बर्नियर के अनुसार विपत्ति में पड़ने के भय से कोई मुगल ऐसी स्त्री की रक्षा नहीं करता ) ऐसा करके वे हिन्दू धर्माधीशों के साथ संघर्ष से बच जाते थे। धीरे धीरे समाज में इस सती प्रथा के द्वारा की जाने वाली स्त्री हत्या बहुत अधिक बढ़ गयी थी। फ्रांस्सिको पैल्सर्ट ने जहांगीर के समय में आगरा के आसपास हर दूसरे दिन सती होने की बात कही है और यह स्थिति तब की है कि इससे पहले अपने समय में अकबर ने इसे रोकने के तमाम सम्भव प्रावधान किये थे और जहांगीर ने इन सब को ज्यों को त्यों बदस्तूर जारी रखा। अकबर से पहले के शासक इस से निरपेक्ष थे। ऐसे में कबीर जैसे व्यक्ति के लिये सीधे तौर पर इन मामलों में हस्तक्षेप करना काफी कठिन रहा होगा। वैसे आंकडे भी यह कहते हैं कि सती की संख्या उसी इलाकों में अधिक तेजी से बढ़ी जहां मुसलमानों का राज्य में सीधा हस्तक्षेप नहीं था। कबीर की कविता सती का विरोध नहीं करती यह एक साबित तथ्य है, पर कबीर के यहां एक द्वन्द्व है। सती का आदर्श और जीवित स्त्री के जलाने के बीच द्वन्द्व। बहुत बार वे सती का समर्थन करते देखे जाते हैं और बहुत बार ऐसी घटना से बहुत आहत। मेरा उद्देश्य कबीर के समर्थन या विरोध से अधिक यह देखना है कि समाज में प्रचलित एक सामाजिक अनाचार के चित्रण भर का है। जिसका विभाव ऐसे सन्दर्भो से निर्मित होगा वही इनको सामने लायेगा और इनका सामने लाया जाना ही बहुत बड़ी बात है।
जायसी ने पद्मावत में सती का वर्णन किया है। रत्नसेन के मरने पर दोनों रानियाँ सती होती हैं। यह वर्णन सती के बारे में सुनासुनाया अधिक लगता है, इसमें प्रत्यक्ष का अनुभव नहीं मालूम पड़ता है। सती के लिये जाती हुई रानियों तक तो जैसी प्रथायें चलती थीं वैसा ही वर्णन है-पटोरी पहने, केश खोले हुए, ‘सिंदुर से माँग भरा सीस’ उघारे, खाट पर बैठकर सती होने गयीं। अन्त में लिखते है-‘लागी कंठ आगि दै होरी।छार भई जरि अंग न मोड़ी॥’ यह सती की ही महिमा है कि आग में जले भी और हाथ पैर भी न मारे, छटपटाये भी न। चमत्कार और महिमामण्डन। हिन्दी आलोचको का यह हाल है कि उनको इस करुण दृश्य में भी औरत का ‘औरतपन’ ही नजर आता है। जायसी के प्रसिध्द समीक्षक विजयदेव नारायण साही ‘पद्मावती नागमती सती खण्ड’ की समीक्षा करते हुए लिखते हैं कि ‘सहमरण तक सौतिया डाह बना रहा।’ जहाँ यह मान्यता बनी हो कि औरतों में अक्ल ही कहां होती है वहाँ इससे अधिक क्या उम्मीद की जा सकती है।
तुलसीदास रामचरित मानस में तत्कालीन जीवन का इतना बड़ा फलक उठाकर भी सती के प्रसंगों पर चुप लगा जाते हैं जो कि रामकथा के तुलसी के पहले के ग्रन्थों में पाया जाते हैं और तत्कालीन समाज में भी सती की घटनायें आये दिन होती रहती थीं। सुलोचना सती प्रसंग रामचरित मानस में नहीं है। सवाल है कि ऐसा क्यों? पार्वती और सीता के रूप में दो स्त्रियां अपने जीवित अथों में सती हैं, सीता की अग्निपरीक्षा सती से कुछ कम कारुणिक नहीं है। रामचरित मानस में सीता को पातिव्रत की शिक्षा देते समय अनुसुइया सीता को बताती है-‘पति प्रतिकूल जनम जँह जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई।’ पवित्रता का वर्जनामूलक लोक उपदेश। राक्षस स्त्रियां तुलसीदास की नजर में सम्भवत: इस पैमाने पर सती नहीं हैं। सुलोचना सती प्रसंग रामचरित मानस में न आना कदाचित तुलसी के मन में राक्षस जाति के प्रति इसी रवैये का प्रतीक है, इसे तुलसी का स्त्री के प्रति उदार रवैये की संज्ञा नहीं दी जा सकती, क्योंकि पूरी रामचरित मानस में स्त्री के प्रति उनके उद्गार किसी से छिपे नहीं हैं। दूसरे यह कि तुलसी सती प्रकरण पर कोई पक्ष अख्तियार करने को तैयार नहीं हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि रामकथा पर लिखे संस्कृत के ग्रन्थों में तो रावण की पत्नि मन्दोदरी तक के सती होने का वर्णन मिलता है। कुल मिलाकर तुलसी की नजर में जगत में दो ही स्त्रियां सती हैं सीता और पार्वती, दोनों ही आग से गुजरती हैं, शेष सब तो ‘ताड़ना’ के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। तुलसी की पॉलिटिक्स हमेशा अपने हित के अनुकूल सती की अवधारणा को राक्षसों को हीन साबित करने में कर ले जाते हैे। सती को वे मूल्य मानते हैं तथा स्त्रियों की प्रतिष्ठा के पैमाने के रूप में देखते हैं इस बात में कोई संदेह नहीं है।मथुरा के पास यमुना नदी पर बना सती घाट हजारों स्त्रियों की जिन्दा जलाये जाने की कहानी कहता है पर महाकवि सूरदास को किसी एक की भी आवाज नहीं सुनाई पड़ी। सती का प्रयोग कुछ जगहों पर सूर सागर में करते हैं पर उसका मन्तव्य अलग है। डॉ.मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है ”कबीर, जायसी और तुलसी के काव्य में स्त्री सामन्ती रूढ़ियों में जकड़ी हुई है लेकिन सूरदास के काव्य में स्त्री का सहज, स्वतन्त्र और तेजस्वी रूप मिलता है।….’सूरसागर’ में केवल एक जगह सतीप्रथा का उल्लेख है। वहां भी उस प्रथा की भर्त्सना ही है।” उदाहरण के रूप में वे इस पद को लाते है ”देख जरनि, जड़, नारि की, (रे) जरति प्रेम के संग/ चिता न चित फीकौ भयौ, (रे) रची जु पिय के रंग।” यहाँ हम दो बातें कहना चाहते हैं। एक पाण्डेय जी जो अर्थ लगाते हैं वह अनर्थ है। इस कविता का जिसकी पहली पंक्ति है ‘मन रे, माधव सौं करि प्रीति’, भाव मन को यह प्रबोध कराना है कि वह माधव से प्रीति करे। किस तरह की प्रीति करे? इसके लिए सूर की जिस तरह की शैली है उसमें एकनिष्ट प्रेम के जितने उदाहरण दिये जाते हैं सब गिनाते हैं और उसी में सती को एकनिष्ट प्रेम का उदाहरण बताते हैं और ‘जड़’ नारी के लिए नहीं (जैसा कि पाण्डेयजी मानते हैं) बल्कि मन के लिए लाया गया ‘सम्बोधन’ है। दूसरी बात यह कि सूरसागर में अन्य स्थानों पर भी सती प्रथा का उल्लेख है, सूर इसी भाव में सती का उदाहरण पेश करते हैं। मसलन ”रे मन निपट निलज अनीति/जियत की कहि को चलावै मरति विषयनि प्रीति/……………….. ……/देह छिन छिन होति छीनी दृष्टि देखत लोग/सूर स्वामी सौं बिमुख ह्वै सती कैसे भोग?” सती न होना निपट निर्लज्जतापूर्ण अनीति है। कैसे कह दूं कि सूरदास सती प्रथा के विरोधी हैं। समर्थक भी उस रूप में नहीं हैं। वे सती को भक्ति के लिये आवश्यक एकनिष्ठता की भावसाम्यता के रूप में लाते हैं। उद्देश्य भक्ति को महिमामण्डित करने का है न कि सती को। पर इससे सती भी महिमामण्डित होती है। सूरदास में सती का सन्दर्भ एक अन्य भाव के लिय मिलता है। उन्होने लिखा है ‘लरिकई ते करति ढ़ंग तब रहे सति भाउ। अब करति चतुराई जानैं, स्याम पढ़ाये दाउ॥’ ‘सती’ यहां भाव है जो कि पवित्रता को व्यक्त करता है। वैसे भी सूर और भक्तिकाव्य की कृष्ण काव्य परम्परा स्त्री के वस्तुकरण की प्रश्रय देने वाली है। सती वस्तुकरण की चरम परिणति है। फिर सती का महिमामण्डन न पाया जाना स्त्री को एक ऐसी प्रस्थिति मंह ले जाकर खड़ा करता है जहां से वह परकीयत्व के दरवाजे की और धकेली जाती है, दरबारों, मठों और वेश्यालयों की शोभा कारक बनती है। अगर यह परम्परा सती के आदर्श का महिमामण्डन करती तो रंगजी के मन्दिर में एकत्र विधवा समूह( जिन पर कि पुजारियों और महन्तों को दुराचार का दैवीय अधिकार था।) को वहां प्रश्रय नहीं मिल पाता। कृष्ण काव्य परम्परा में शायद ही कभी सती सवाल बनी हो क्योंकि वहां स्त्री को परकीया बनाकर कृष्ण की अंकशायिनी बनाया गया है, रासलीला का हिस्सा बनाकर।
भक्त कवियों में अन्य सन्त कवियों ने सती को आदर्श के रूप में स्वीकार किया है। खास बात है कि वे एक साथ दो आदर्श रखते हैं- सती और जोगिन। जोगिन होना भी एक बड़ा फेनोमिना है, उसके लिये पति का मरना या न मरना कोई सवाल नहीं है, स्त्री की सामाजिक असंतुष्टि इसका आधार है। सती होने से बच जाने वाली स्त्रियां भी जोगिन होती होंगी, क्योंकि अपने समाज परिवार में लौटना उनके लिये सम्भव नहीं था। आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि सास ननदें घर की स्त्रियों को जोगियों से बचने का उपदेश देतीं थी। यह चिन्ता यहां समझी जा सकती है (जोगियों से मिलने से सती के भाग जाने की सम्भावना पैदा होने का खतरा है, कोई आसरा तो हो सकता था, जोगिन होना कम से कम स्त्री को जीने का अधिकार तो देता है।)। सूरदास भी गोपियों के द्वारा जोगिन होने के विरोध का उपक्रम रचते हैं और कृष्ण काव्य के लिये स्त्री के परकीयत्व की भूमिका तैयार करते हैं। सती कोई एक स्त्री नहीं है, वह स्त्री के जलाये जाने की प्रथा का सामूहिक प्रतिबिम्ब है। उसमें उम्र, जाति, वर्ग, क्षेत्र और मन:स्थिति व परिस्थिति के अनेकों करुण प्रसंगों का समावेश है। कबीर की कविता इस सती के सामाजिक स्वरूप का बहुआयामी चित्र सामने लाती है। कबीर का एक पद है ‘सेजै रहूं नैन नहीं देखीं, बहु दु:ख कासौं कहूं हे दयाल।…….’ सती होने वाली स्त्री की हालत यह है कि उसने पति के साथ सेज पर रहना कभी नहीं देखा और सती होने जा रही है। सास उसके कारण दु:खी है (व्यवहार में पति के मरने का ठीकरा स्त्री के भाग्य पर फोड़ा जाता है और इसी आधार पर सास उसे अपने पुत्र के मरने का दोषी मानती है, इसीलिये दु:खी है।) ससुर की प्यारी है (पारिवारिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने के कारक सती होनें का बीड़ा जो लिया है, यदि वह सती होने से इंकार कर देती तो ससुर के प्यार का पता चलता) और जेठ से तरस की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। ननद दु:ख को समझने वाली सुहेली हो सकती थी पर वह गरब की भरी है (उसकी भौजाई सती होकर ऐसा उदाहरणीय काम जो करने जा रही है जिसकी सदियों तक पूजा होगी)। देवर उपस्थित नहीं है, उसका विरह बहुत खटक रहा है (सम्भवत: ऐसी जाति की स्त्री सती हो रही है जिनमें देवर के साथ बिठाने की परम्परा रही है। ऐसा लगता है कि जानबूझकर देवर को अनुपस्थित कर दिया गया है। यह अनुपस्थिति उसे खटक रही है अगर होता तो शायद उससे कोई आशा बँधती और स्त्री बच जाती)। बाप माया के वशीभूत सबसे लड़ाई करता फिरता है। सगे भाई के सहारे जब चिता पर चढ़ूगी तब ही पति की प्यारी कहलाउंगी। दोस्तो सोचविचार कर देखो यह कैसा अवसर बन आया है।’ कबीर के यहां बहुत बार गौना होकर आने का चित्र आता है लेकिन गौने से जाती स्त्री को बन में ही डोली से उतार लिया जाता है बन के बीच वह गुहार लगाती है पर कोई नहीं सुनता। कबीर अपने सती प्रकरण पर कहते हैं –लिखा लिखी की है नहीं देखा देखी बात -(कौन सी बात?)-दुलहा दुलहिनि मिलि गये- फीकी परी बरात’। सती करने के बाद लौटने वाला हुजूम या बरात इसी भाव में लौटते हाेंगे। विवाह की बारात में दुल्हा दुल्हन के मिलने से फीकापन नहीं आता है, रंग और चढ़ता है। इसीलिए दुल्हा दुल्हन का अर्थ व्यंग्यात्मकता धारण कर लेता है और विवाह के दृश्य को चीरकर सती करके लौटता हुजूम सामने आ जाता है। हरि मोरा पिउ मैं हरि की बहुरिया। राम बड़े मैं तनिक लहुरिया।/किएउं सिंगारु मिलन कै ताई हरि न मिले जग जीवत गुसांई। /धनि पीउ एकै संग बसेरा, सेज एक पै मिलन दुहेरा। /धन्नि सुहागिनि जो पिउ भावै, कह कबीर फिरि जनमि न आवै।’ धन्नि सुहागिन से इस कविता में व्यंग्य होने का पता चलता है। यह लोक की शैली है। बेमेल विवाहोपरान्त सती होने पर दोहरा लाभ-पति मिलन और परम मोक्ष की प्राप्ति? जीवित रहते जिस पुरुष ने नहीं अपनाया उसे पाने की इच्छा। धन्य है वह हिन्दू नजरिया जो स्त्री को ऐसा झांसा देकर मार डालता है। आज तक की हिन्दी मानसिकता इस छोटी सी बात को नजरन्दाज कर कविता के भीतर की सती को गायब कर
वहाँ जीवात्मा और परमात्मा ले आती है। सती होना एक पारिवारिक निर्णय (हत्या) है न कि व्यक्तिगत (आत्महत्या)। कबीर लिखते हैं ‘दुलहिनि तोहि पिया घर जाना। काहे रोवो काहे गावो, काहे करत बहाना। काहे पहिरयो हरी हरी चुरियाँ पहिरयो प्रेम का बाना।’ हरी हरी चूंड़िया पहनना और प्रेम का बाना पहनना दो स्थितियां हैं। एक विवाह के अवसर पर पहना जाता है तो दूसरा सती होने के लिये जाती स्त्री का लिबास है। यहां ‘बहाना’ पर ध्यान देना चाहिए, जो कि सती न होने की इच्छा को और मजबूरी को दिखता है। जब निर्णय अपना न हो तो बहाना करने के अलावा सती से बचने का चारा ही क्या है? सती प्रथा के आरम्भ से ही सती के लिये विशिष्ट वेश का जिक्र मिलता है। हर्ष चरित में वाणभट्ट ने हर्ष की माता के सती होने के समय के ‘मरण प्रसाधन’ का वर्णन करते हुए लिखा है कि उसके शरीर पर लाल पट्टांशुक, गले में लाल सूत्र और अंगों पर कुंकुम का अंगराग था’ । कालान्तर में यह वेश विशिष्ट सोलह श्रंगार में बदल गया। लोक गीतों तक में सती के लिये आभूषणों तक की अनिवार्यता को रेखांकित किया जा सकता है। विशेष रूप से सजाये जाने से स्त्री के दिमाग पर एक अलग तरह का दबाव बनता है, वह अपनी आभा में स्वयं को दिव्य और विशिष्ट मानने लगती हैं। इस आभासीय विशिष्टता में ही सती होने और किये जाने के भेद को छुपा दिया जाता है। ‘हंसा संसय छूरी कुहिया,…… तासु बचन क्या लीजै।’ पद में सती के दारुण दृश्य का जैसा प्रभाव कबीर ने अनुभव कराया है कहीं नहीं मिलता। भूभुरि चिता का वह रूप है जिसकी आग अभी ठण्डी नहीं पड़ी है। चिता की राख को सरोवर में सिराने का विधान है जिसके परिपालन में इस भूभुरि में भी तड़फ उठती है(जलते समय की तड़फ की तो बात ही क्या), शेष धूरि(धूल- जो पहले सती हुई स्त्रियों की ठण्डी राख है) इसकी तड़फ पर हिलोरा मारती है। इतनी बड़ी संख्या में इस सती स्थल पर सती हुई हैं कि उनकी राख से सरोवर पट गया है, पानी सूख गया है, हंसों का उड़ जाना एक मजबूरी है। जब तक अपने जीवित थी उसे दो कौड़ी का नहीं समझा, जब जीवन की सम्भावना ही समाप्त हो रही है तो बचन (आशीर्वाद) ले रहे हो। हिन्दू परिवार व्यवस्था अपने सदस्यों के जीवन के विभिन्न चरणों का निर्धारण करती है। स्त्री पुरुष के सम्बन्ध भी बहुत हद तक इस परिवार व्यवस्था के नियमों के अधीन ही होते हैं। व्यक्तिगतता की भूमिका वहां नहीं होती है। सती किया जाना भी इन्हीं पारिवारिक नियमों के अन्तर्गत सम्भव होता है। जबकि सती होने वाली स्त्री पर इसका कारण थोपना इसके नियम को व्यक्तिगतता का जामा पहनाने की कोशिश है। ”साँई के संग सासुर आई।/संग न सूती स्वाद न मानी, गयो यौवन सपने की नाँई।/……. अरघा दे लै चली सुहासिनि, चौके राँड़ भई संग साँई/भयौ विवाह चली बिनु दूल्हा, बाट जात समधी समुझाई।/कहै कबीर हम गौने जैबे तरब कन्त लै तूर बजाई।” यौवन और जीवन दो मनुष्य जीवन की ऐसी स्थितियां हैं जिनको छोड़ देना सबसे बड़ा परित्याग है। सार्थक जीवन के इन दो पहलुओं को दुवारा नहीं पाया जा सकता। पारिवारिक नियमों के अधीन वह पति के साथ ससुराल आती है। तमाम सपने सजाये होंगे, लेकिन न तो सांई के साथ सो पाई और नहीं जीवन के स्वाद को कुछ समझा, यौवन का सपना सपना ही रह गया। यहाँ अरघ देते समय फ्लैशबैक शैली में दृश्य उभरता है कि किस तरह विवाह का उत्सव सम्पन्न हुआ और स्त्री का यौवन का स्वप्न साकार होता दिखा कि यह स्वप्न स्वप्न की तरह ही क्षण भर में बीत गया(सम्भवत: पति इससे पूर्व ही मर गया।) अरघ देकर हँसती हुई सती होने के लिये, जिसकी प्रक्रियाएं दूसरे विवाह की तरह ही होती थी,ं चल पड़ी। रास्ते में जाते हुए सम्बन्धियों ने समझाया। कैसा विजयोत्सव होने जा रहा है? तूर्य बजाकर गौने जाना, तर जाना। समधी को समझी पढ़ा जाय तो कविता का अर्थ उद्भासित होने लगता है। ‘समझी समुझाई’ एक तरह से मान मनौवल का ही एक रूप है जिसमें न मानने वाले व्यक्ति को साम, दाम, दण्ड, भेद हर रीति से उसे निर्धारित लक्ष्य के लिए तैयार किया जाता है। इसी पद की व्याख्या जब की जाती है तो आलोचक फ्लैशबैक को झुठलाकर न केवल अध्यात्मक अर्थ ग्रहण करने लगा बल्कि लौकिक विभाव में इस बात तक पहुँच गया कि ‘गाँठ जोरि भाई पतियाई’ का अर्थ है स्त्री मन की कुंठावश अपने भाई को ही अपना पति मान बैठी। जब स्त्री के प्रति यह नजरिया आपके पवित्रतावादी मन में घर किये हुए है कि स्त्री अपनी योनेच्छा में मतिभ्रमित तक हो सकती है, किसी भी हद तक जा सकती है तो फिर स्त्री सम्बन्धी काव्य सन्दर्भों पर आप क्या राय रख सकते हैं? समझा जा सकता है। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी इस पर की व्याख्या में लिखते हैं कि यह दाम्पत्यभाव की वियोगावस्था की प्रतीक योजना है जिसमें ”विवाह विधि के संपन्न होते ही, वैधव्य के अनुभव का दु:ख उलट वाँसी के द्वारा बतलाया है।….साधारण प्रकार की विरहावस्था का वर्णन न कर उसके विचित्र कसक और विवशता का परिचय कराया गया है जो अपनी ही भूल के कारण है।” हिन्दी मानसिकता की बलिहारी है कि सारी सामाजिक वास्तविकाता को विरहावस्था कि विचित्र जाल में फंसाकर सती होने वाली स्त्री के सिर ठीकरा फोड़ दिया और उसके सती होने के जिक्र तक को छुपा गये। जौं रोऊँ तो बल घटै, हसौं तो राम रिसाइ/मनही माँहि बिसूरनाँ ज्यूँ घुन काठहिं खाइ। सती होने वाली स्त्री के भीतर क्या चल रहा होता है-अपारद्वन्द्व। सती होना सामाजिक मजबूरी है और जीवन एक निहायत व्यक्तिगत आकाँक्षा। समाज और व्यक्ति के भीतर का द्वन्द्व। जब व्यक्ति के रूप में स्त्री हो वह भी मध्ययुग में तो जीतना किसको है, सबको पता है। अगर रोती है तो सती की शक्ति कम होती है, सतीत्व पर ऑंच आती है, हँसती है तो राम को गुस्सा आता है। सम्भवत: यह किसी ऐसे व्यक्ति की पत्नि है जो गुस्से में उसे बहुत मारता होगा। इस मारपीट का आतंक उसके ऊपर हावी है। उसकी ऐसी स्थिति है कि उसे मन में ही बिसूरना है, जैसे घुन लकड़ी को खा रहा हो। रैनि गई मति दिन भी जाइ।/भँवर उड़े बग बैठे आइ।/थरहर कंपै बाला जीउ, ना जानौ क्या करिहै पीउ/काँचे करवै रहे न पानी, हंस उड़ा काया कुम्हिलानीं/काग उड़ावत भुजा पिरानी, कहै कबीर यहु कथा सिरानी।/शव पड़ा हुआ है खींचतान में रात बीत गई मसला न सुलझने के कारण दिन के भी बात जाने की आशंका है। स्त्री सती नहीं होना चाहती और लोग सती करने पर आमादा हैं। लोक में एक बात चलती है कि किसी भी काम में देर लगाने या हीला हवाली करने पर प्राय: यह कह दिया जाता है कि क्या सती हो रहे थे? अथवा लगता है अमुक तो सती हो गया?। यहाँ सती होना एक शब्द रूढ़ि है जिसका अर्थ स्पष्ट है। इस रूढ़ि के निर्माण में काम को न करने की इच्छा और न मना कर पाने की क्षमता के तनाव के बीच से जो बिलम्ब जन्म लेता है वही मात्र आधार है और सती होने के क्रम में कभी भी स्त्री की इच्छा नहीं होती थी, प्राय: मना करने की क्षमता नहीं होती थी और मना करने वालों के साथ जोर जबरदस्ती तो जग जाहिर है। इस सारे उपक्रम में बिलम्ब होता ही था। यही स्थिति यहां दिखाई देती है। सती होने के नाम पर उस बालबधू का जीउ थरथर काँप रहा है। लेकिन दिमाग पर यह हाबी कर दिया गया है कि सती न होने पर पति (अकाल मृत्यु के कारण आत्मा स्वर्ग नहीं जा सकती, उसके साथ सती होने वाली स्त्री उसे स्वर्ग लेकर जाती है। ऐसा नहीं करने पर पुरुष की आत्मा इसी लोक में भटकती रहेगी)भूत बनकर तुम्हारे साथ कुछ बुरा करेगा। तुम्हें जीने नहीं देगा। इस आतंक के कारण उसमें मना करने की क्षमता नहीं है। पुण्य के लाभ का इस छोटी सी लड़की के लिए कोई अर्थ नहीं है, मरने के बाद पति द्वारा सताये जाने के आतंक ने उसे सती होने की ओर धकेल दिया है। कच्चे घड़े को पानी में डाल देने के बाद घड़ा ही मिट्टी में बदलने लगता है, मरने के बाद शव में सड़न शुरू हो जाती है। गंगा के किनारे बड़े पैमाने पर दूर दराज के इलाकों से ऐसी स्थितियों को लेकर लोग आते थे। रास्ते में लाश सड़ जाती थी और तेज बदबू आने लगती थी। स्त्री सती नही होना चाहती थी और लोग उसे सती करना चाहते थे। ऐसे में समझाने का लम्बा दौर शुरू होता था। इसमें लाश और भी सड़ती जाती थी। सड़ी हुई लाश के साथ हर किसी का रूके रहना सम्भव नहीं है और कोई लाश के पास रहेगा नही ंतो लाश को कउऐ नौचना आरम्भ कर देंगे। और यही हो रहा है। कौये भगाते भगाते हाथ थक रहे हैं। यही कुल कथा का अन्त करके कबीर चल देते हैं। यह स्त्री कथा का भी अन्त है। डॉ.वासुदेव सिंह लिखते हैं कि ”यह मुग्धा नववधू के प्रतीक द्वारा जीवात्मा की स्थिति का निरूपण किया है।” सती होने के लिए मजबूर की जाती बालवधू में मुग्धा नायिका खोज निकालना और उसके सहारे कविता के सामाजिक सरोकारों को छुपा जाना यह हिन्दी आलोचकों के ‘जानपाण्डे’ होने का प्रमाण है।
स्त्रीत्व और सतीत्व दोनों को एक दूसरे के विलोमार्थक सन्दर्भों में देखा जाना चाहिए। स्त्री बने रहने की इच्छा सती होने से रोकती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘सती’ को ‘पवित्रता’ का पर्याय मानते है। पवित्रता की अवधारणा का सारा अभियान स्त्रीत्व पर ”पाबन्दियों” के जरिये काबू पाना है। ”जब लग पिउ परचा नहीं कन्या क्वारी जाँनि/हथलेवा हौंसे लिया मुसकल पड़ी पिछाँनि।” क्वारी कन्या तो कुवाँरी है ही, विवाहित होने पर भी जब तक पति से परिचय न हो कन्या कुमारी ही मानना चाहिये। जब विवाहित हो गयी ता फिर पति से परिचय के लिए अन्य किसी हथलेवा की कोई जरूरत ही नहीं। लेकिन कबीर फिर से हथलेवा की बात करते हैं। हथलेवा एक तरह से साथ निभाने की प्रतिज्ञा है। फिर से इसकी आवश्यकता बताती है कि किसी अन्य तरह के सन्दर्भ में साथ निभाने की प्रतिज्ञा और स्त्री जीवन में यह प्रतिज्ञा सती होने के लिए ही हो सकती है। कविता में तनाव दो स्थितियों से पैदा होता है पहली स्थिति है विवाहित होने पर भी क्वारी होने की अर्थात ऐसी लड़की जिसका गौना नहीं हुआ है, दूसरी स्थिति है फिर हौंस में आकर(किसी के बरगलाने पर) हथलेवा लेने की। कम उम्र की लड़की जिसका गौना तक नहीं हुआ है वह हौंस में आकर, लोगों के बरगलाने और प्रोत्साहित करने पर सती होने की प्रतिज्ञा कर बैठती है, वास्तविक मुसीवत तो तब सामने आती है जब बीड़ा उठाने के ऐवज में वास्तव में सती होना पड़ता है। यह स्त्री जीवन की बहुत बड़ी त्रासदी है। जबकि इसकी व्याख्या में आलोचक कहता है कि बिना सोचे साधना के मार्ग पर साधक चल तो पड़ता है पर प्रभु की माँग जब सामने आती है तो उसके सामने संकट खड़ा हो जाता है। यहाँ आलोचक महोदय को यह भी बताना चाहिए था कि आखिर प्रभु माँगता क्या है?”डग मग छाँडि देइ मन बौरा /अब तौ जरै मरै बनि आवै लीन्हों हाथ सिंधौरा।” हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है ”और फिर जिस सती ने हाथ में सिंदूर की डिबिया ले ली है उसे मृत्यु का क्या डर। सिंदूर की डिबिया अर्थात अचल सौभाग्य की निशानी” । फिर डगमग का सन्दर्भ कहाँ से आ टपका और ‘जरने मरने की बन आने’ जैसी मजबूरी को क्या कहैं। सिंधौरा विवाह के समय स्त्री को सौपा जाने वाला वह प्रतीक चिन्ह है जो स्त्री को एक प्रस्थिति सौंपे जाने से सम्बध्द है। सिंधौरा स्त्री के साथ साथ ही घूमता था चाहे वह माइके जाये या ससुराल या अन्य कहीं। फिर
दुवारा से सिंधौरा लेने की कौन सी प्रथा या सन्दर्भ सामने आ गया। जब एक बार सिंधौरा ले लिया तो पति के मरने पर उसे उसके साथ जल मरना ही है। इसमें साहस की कौन सी बात है। केवल और केवल मजबूरी है। जिस तरह यहाँ जान पर बन आने को साहस का नाम दिया जा रहा है उसी तरह सती को स्त्री की इच्छा का नाम दिया गया है। हजारीप्रसाद द्विवेदी कहीं भी समाज में स्त्री की प्रस्थिति सम्बन्धी मजबूरियों को उठाने के बजाय इसे इस तरह लिखते हैं कि पता नहीं यह कितने गौरव की बात है। वह भी सती प्रथा विरोधी अधिनियम के साठ सत्तर साल बाद। हिन्दी आलोचना के सौ वर्षों के इतिहास में हिन्दी मानसिकता का जो रूप सामने आता है वह ऐसे ही निर्णयों से बनता है।
बड़ी ही हैरत में डाल देने वाली बात है कि अभी हाल ही में एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी के महासचिव ने बयान दिया कि ”सरकार सती होना चाहती है।” सरकार अपने गिरने के लिए उत्तरदायी है यह कहना तो ठीक है, आपका राजनीतिक विश्लेषण है लेकिन इसमें स्त्री को लपेटना और यह मानना कि सती होना स्त्री की इच्छा पर आधारित घटना है, राजनीतिक मानसिकता में छिपे पितृसत्तावादी रवैये की सूचना देती है। इसी मानसिकता की शिकार हिन्दी आलोचना रही है। हिन्दी आलोचना की दोनों परम्पराओं पर इस मानसिकता का कब्जा है। स्त्री के पक्ष को सामने लाने के लिए स्त्री जीवन के सूक्ष्मतम से लेकर स्थूल प्रसंगो के प्रति बने हुए पूर्वग्रहों और मूल्यनिर्णयों की समीक्षा के बीच से ही राह निकलेगी और वह पितृपक्षीय हिन्दी मानसिकता के दंश से अपने आपको बचा पायेगी।
सिंदूर पूरी तरह से जादू में बदल गया है।स्त्री जीवन के दिन की शुरुआत मांग में सिंदूर पहनने से होती है। सिेंदूर अधिक न खर्च करना, भर मांग सिंदूर न लगाना, मंगल गीतों के अवसर पर गीत गाने वाले स्त्रियों को सिंदूर पहनाना आदि आदि अनेकों टोटके प्रचलित हैं।
वीर सतसई, पद 58
हजारी प्रसाद द्विवेदी, ग्रन्थावली भाग 4, पृ.349
रामविलास शर्मा, भारतीय साहित्य की भूमिका, पृ.319
रामविलास शर्मा, भारतीय साहित्य की भूमिका, पृ.319
शरतचन्द्र, नारी मूल्य, उद. दस्तक अप्रेल,2000 (नारी विशेषांक)
ज्ीम म्दहसपेी ूवतो व ित्ंउडवींद तवल एचण्330
प्रारम्भिक भारत का सामाजिक और आर्थिक इतिहास पृ.90
बर्नियर पृ. 192
बर्नियर पृ. 193
मीरा का काव्य, पृ.27
इब्बन बतूता का भारतयात्रा, सती वृतान्त पृ. 24-25
अकबरनामा पृ.402
इस सन्दर्भ में उमादे भटियारो रौ कवित, रावरायसिंग री राणियां रा कवित्त, रूपनगर री सतियां रा कवित्त, महाराजा मानसिंग री सतियां रा कवित्त, गीतकुम्भै री सती रौ, गीत सती लालबाई रौ, गीत सती हमीरा रौ, नाम लिये जा सकते हैं।
मुजीब रिज्वी, मध्यकालीन धर्मसाधना, इन्द्रप्रस्थ भारती, कबीर विशेषांक, पृ.10
डॉ. वासुदेव सिंह, कबीर वाड़्मय, खण्ड 3 , पृ.48
परशुराम चतुर्वेदी, कबीर साहित्य की परख, पृ.102
ट्रेवेनियर ज्ंअमतदपमतए टवसण्प्प्ए चण्168
इब्बन बतूता का भारतयात्रा, सती वृतान्त पृ. 25
फ्रास्सिको पैल्सर्ट, जहांगीर कालीन भारत,अनु0 भादानी पृ.102-103
बर्नियर पृ. 193
विजयदेव नारायण साही: जायसी, पृ0 109
कुमारदास कृत जानकीहरणम्
मैनेजर पाण्डेय, भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य, पृ. 26
हर्ष चरित पंचम उच्छवास
डॉ. वासुदेव सिंह, कबीर वाड़्मय, खण्ड 2 , पृ.396
परशुराम चतुर्वेदी, कबीर साहित्य की परख, पृ.148
ट्रेवेनियर ज्ंअमतदपमतए टवसण्प्प्ए चण्168
डॉ. वासुदेव सिंह, कबीर का प्रतीक विधान, संकलित,कबीर, सं. डॉ. वासुदेव सिंह, पृ.191
हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, पृ
हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर, पृ 350